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How is electricity made बिजली कैसे बनती है



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How is electricity made?

क्या आप लोग जानते हैं बिजली कैसे तैयार होती है

बिजली बनाने के पीछे जो नियम है वह है चुम्बक के चलने पर बिजली का पैदा होना। विज्ञान का यह सिद्धांत है की जब एक चुम्बक को तार से लपेट दिया जाये और चुम्बक घूमने लगे तो तार में बिजली बहने लगती है या फिर एक तार को किसी छड़ पर लपेट दिया जाए और इसे किसी चुम्बक के बीच में रख कर घुमाया जाए तो इन तारों में बिजली बहने लगेगी।

1431 में माइकिल फेरेड़े नाम के ब्रिटिश वैज्ञानिक ने यह सिद्धांत खोजा था। उन्होंने ने पाया की एक ताम्बे के तार को किसी चुम्बक के पास घुमाएं तो उस तार में बिजली बहने लगती है। यानी अगर एक चुम्बक और एक तार (जो बिजली चालक हैं) के बीच अगर गति है तब तार मं बिजली पैदा होती है। तार को आप एक बल्ब से जोड़ दें तब यह बल्ब जलने लगेगा।

यह आप अपने घर में भी आसानी से कर सकते हैं। घूमते हुए तार की यांत्रिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में बदल जाती है। इसी नियम को आधार मानकर चलते हैं सारे बिजली घर।

अब हमें यह पता चल गया की बिजली पैदा कैसे हो सकती है। तो हम क्रम से सोचें की कैसे हम एक बिजली घर बना सकते हैं और हमें किन चीज़ों की ज़रुरत पड़ेगी। ऊपर वाले नियम को लागू करने के लिए हमें चाहिए बहुत बड़े चुम्बक, तार जिनमें बिजली का प्रवाह हो सकता है, एक बहुत बड़ी छड़ जिस पर यह तार बंधा हो, और इस को छड़ को चलाने के लिए कोई मशीन।

घर में आपने किसी बर्तन को कभी ढंककर पानी उबाला है। अगर किया है तो देखा होगा की पानी उबलने पर ढक्कन या तो गिर जाता है या उछलने लगता है। इसके मतलब भाप में ऊर्जा है जो हम किसी मशीन को चलाने में इस्तेमाल कर सकते हैं।

याद है जेम्स वाट ने स्टीम इन्जन की शुरुआत इसी तरह उबलते पानी को देखकर की थी। तो फिर क्यों न हम इसी भाप से अपनी छड़ को चलायें? पर भाप बनाने के लिए चाहिए बहुत सा पानी और बहुत सा इंधन। हम अपना बिजली घर ऐसी जगह लगायेंगे जहां पानी का स्रोत हो जैसे कोई बहुत बड़ी झील या नदी।

इंधन के लिए हम इस्तेमाल कर सकते हैं कोयला। लीजिये हमारे कोयले से चलने वाले बिजली घर की रूप रेखा तैयार हो रही है। अब देखते हैं की असली बिजली घर में यह सब कैसे होता है।

कोयले से चलने वाले बिजली घर सबसे ज़्यादा पाए जाते हैं। इन्हें थर्मल पावर प्लांट कहते हैं। इसमें कोयला जला कर पानी को उबाला जाता है। कोयले को फर्नेस (furnace) में जलाया जाता है जिसके ऊपर बोइलर होता जहां पानी भरा है। कोयला जितना अच्छा होगा उसमें उतनी ज्यादा उष्ण ऊर्जा पैदा होगी। इसलिए कोयले को एकदम पाउडर बना दिया जाता है।

पानी भाप बनकर बहुत ही मोटे पाईप से निकल कर टर्बाइन में जाता है। या फिर ऐसा भी होता है की फर्नेस में ही मोटे मोटे पाईप घूमते हैं जिनमें पानी बहता रहता है। यह गर्म हो कर भाप बन जाता है और इन पाईप का एक सिरा टर्बाइन से जुड़ा होता है।

भाप की ऊर्जा से टर्बाइन घूमती है। टर्बाइन एक बड़ी सी चकरी होती है जिसमें ब्लेड लगे हैं। भाप के वेग से यह जोर से घूमने लगती है। यह जितनी तेज़ घूमेगी हमारा बिजली वाला तार भी उतनी तेज़ घूमेगा और उतनी अधिक बिजली पैदा होगी। इसलिए इस टर्बाइन पर भाप को बहुत ऊँचे दबाव और ऊंचे तापमान से लाया जाता है।

टर्बाइन हमारी उस छड़ से जुड़ा है जिस पर तार बंधे हैं और जो चुम्बक के बीच में रखा है। इस को जेनेरेटर कहते हैं। टर्बाइन के चलने से यह छड़ घूमती है और उससे तार जो चुमकाय क्षेत्र में रखा है।

अब फेरेदे नियम लगना शुरू हो गया और शुरू हो गयी तार में बिजली बहनी! यही बिजली फिर स्विचयार्ड में ले जाई जाती है जहां से यह पारेषण प्रणाली यानी ट्रांसमिशन लाइन के ज़रिये हमारे घरों, कारखानों, दफ्तरों में पहुँचती है। लेकिन वह एक अलग कहानी है। अभी तो हमें देखना है कि टर्बाइन चलाने के बाद जो भाप है उसका क्या करें? इसमें की बहुत ऊर्जा निकल गयी है पर अभी भी यह काफी ऊंचे तापमान पर है।

इस भाप को ठंडा करने वाली मीनार या कूलिंग टावर में ले जाते हैं जहां इसे पाईप में डाला जाता है और इसके चरों ओंर ठंडी हवा घुमाई जाती है जो इसकी गर्मी ले लेती है और यह भाप वापस पानी बन जाती है।

इसे दुबारा फर्नेस में ले जाया जा सकता है। तो यह है हमारे असली बिजली घर की एक रूपरेखा

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